इस लेख में जानिए Dara Shikoh की वो बातें जिसके लिए मोदी सरकार खोद रही है उनकी कब्र? मोदी सरकार ने दारा की क़ब्र को पहचानने के लिए पुरातत्वविदों की एक कमेटी बनाई है जो साहित्य, कला और वास्तुकला के आधार पर उनकी क़ब्र की पहचान करने की कोशिश कर रही है. मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के समय के इतिहासकारों के लेखन और कुछ दस्तावेज़ों से पता चलता है कि दारा शिकोह को दिल्ली में हुमायूं के मक़बरे में कहीं दफ़न किया गया था.

जानिए Dara Shikoh की वो बातें जिसके लिए मोदी सरकार खोद रही है उनकी कब्र?

कौन हैं Dara Shikoh?

दारा शिकोह शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र थे. मुग़ल परंपरा के अनुसार, अपने पिता के बाद वे सिंहासन के उत्तराधिकारी थे. लेकिन शाहजहाँ की बीमारी के बाद उनके दूसरे पुत्र औरंगज़ेब ने अपने पिता को सिंहासन से हटाकर, उन्हें आगरा में क़ैद कर दिया था. औरंगज़ेब ने ख़ुद को बादशाह घोषित कर दिया और सिंहासन की लड़ाई में दारा शिकोह को हराकर जेल भेज दिया.

कब्र की पहचान में क्या है मुश्किल?

सरकार ने दारा की क़ब्र की पहचान करने के लिए पुरातत्वविदों की जो टीम बनाई है, उसमें पुरातत्व विभाग के पूर्व प्रमुख डॉक्टर सैयद जमाल हसन भी शामिल हैं. वो कहते हैं, “यहाँ लगभग एक सौ पचास क़ब्रें हैं जिनकी अभी तक पहचान नहीं हुई है. यह पहचान का पहला प्रयास है.” उनका मानना है कि यह काम बहुत मुश्किल है. हुमायूं के विशाल मक़बरे में हुमायूं के अलावा कई क़ब्रें हैं. उनमें से मक़बरे के बीच में स्थित केवल हुमायूं की ही एक ऐसी क़ब्र है जिसकी पहचान हुई है.

क्यों है मोदी सरकार को क़ब्र की तलाश?

जानिए Dara Shikoh की वो बातें जिसके लिए मोदी सरकार खोद रही है उनकी कब्र?

दारा सिकोह के बारे में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, वो अपने समय के प्रमुख हिन्दुओं, बौद्धों, जैनियों, ईसाईयों और मुस्लिम सूफ़ियों के साथ उनके धार्मिक विचारों पर चर्चा करते थे. इस्लाम के साथ, उनकी हिन्दू धर्म में भी गहरी रुचि थी और वो सभी धर्मों को समानता की नज़र से देखते थे. उन्होंने बनारस से पण्डितों को बुलाया और उनकी मदद से हिन्दू धर्म के ‘उपनिषदों’ का फ़ारसी भाषा में अनुवाद कराया था.

उपनिषदों का यह फ़ारसी अनुवाद यूरोप तक पहुँचा और वहाँ उनका अनुवाद लैटिन भाषा में हुआ जिसने उपनिषदों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाया. भारत में दारा शिकोह को एक उदार चरित्र माना जाता है. भारत में हिन्दू-झुकाव वाले इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि अगर औरंगज़ेब की जगह दारा शिकोह मुग़लिया सल्तनत के तख़्त पर बैठते तो देश की स्थिति बिल्कुल अलग होती.

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