भारतीय शिक्षा पद्धति यानी इंडियन Education System आज जिस दौर से गुजर रही है उसे देख कर तो यही लगता है कि बहुत से बाहरी प्रभावों के कारण वह पंगु हो चली है. वह भारतीय कम और इंडियन ज्यादा हो गई है. भारतीयता की कमी नज़र आती है हमारे एजुकेशन सिस्टम में. जब जनमानस का झुकाव ही पाश्चात्य सभ्यता की ओर ज्यादा हो तो ऐसा होना तो लाजमी है. लेकिन अब इस अन्य परिस्थितियों की तरह इसमें भी बदलाव की ज़रूरत है.

भारतीय Education System में है किस बदलाव की ज़रूरत?

Education System ऐसे सुधर सकता है

ये तो लगभग सभी मानते हैं कि हमारी शिक्षा पद्धति में बदलाव की ज़रूरत है. लेकिन कहाँ पर बदलाव की ज़रूरत है और क्या बदलाव लाए जा सकते हैं इस बात पर मतभेद हो सकता है. फिलहाल के कुछ सालों में इसे बेहतर बनाने के कई प्रयास देखे गए हैं. जैसे कि सिर्फ अंकों की जगह एक विद्यार्थी के सम्पूर्ण विकास की ओर ध्यान दिया जाए, इसके लिए सी.सी.ई. लाया गया है. यह एक सराहनीय कदम है लेकिन इसे पूर्ण रूप से कारगर नहीं कहा जा सकता. शिक्षकों की काबीलियत पर निर्भर इस सिस्टम पर सवाल इसलिए उठाए जा सकते हैं क्योंकि शिक्षकों की गुणवत्ता पर ही आसानी से सवाल उठाया जा सकता है.

भारतीय Education System में है किस बदलाव की ज़रूरत?

Education System को करना होगा पुनरपरिभाषित

दरअसल हमें शिक्षा के उद्देश्य को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है. आज शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य एक बेहतर नौकरी हो गया है जिससे एक व्यक्ति का जीवनयापन हो सके. जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी कई बार इस बात पर बल दे चुके हैं कि हमारे युवाओं को नौकरी ढूँढने वाले की जगह नौकरी पैदा करने वाला होना चाहिए. वो एक स्टार्टअप कल्चर की स्थापना करना चाहते हैं. हमारी शिक्षा पद्धति को भी इसी अवधारणा के अनुरूप होना चाहिए ताकि विद्यार्थी बचपन से ही इस दिशा में सोच सकें और खुद को उस तरह तैयार कर सकें. अगर इस तरह का बदलाव लाया जाता है तो उससे देश के भविष्य में एक बेहद बेहतर परिवर्तन की उम्मीद है.

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