क्या आपको पता है कि शुक्राणुओं (Sperms) की संख्या में कमी से मानव जाति विलुप्त हो जाएगी?
प्रतिकात्मक चित्र

अभी मनुष्य के शुक्राणुओं (Sperms) की संख्या को लेकर हुए एक नए शोध के अनुसार इस बात का पता चला है. ये तो आपको भी पता ही है कि विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ शोध करते रहते हैं. इन शोध से आए नतीजे कई बार हमें चौंकाते हैं तो कई बार डराते भी हैं. हलांकि इससे हम सचेत हो जाते हैं और आने वाली समस्या के समाधान में लग जाते हैं. तो आइए देखते हैं कि क्या है ये नया शोध.

क्या आपको पता है कि शुक्राणुओं (Sperms) की संख्या में कमी से मानव जाति विलुप्त हो जाएगी?
प्रतिकात्मक चित्र

क्या है शुक्राणुओं (Sperms) पर ये शोध?

रिपोर्ट्स के अनुसार इस शोध से ये पता चला है कि मनुष्य जाती में शुक्राणुओं की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. यदि इसी बात को दुसरे शब्दों में कहें तो यदि शुक्राणुओं के कम होने की ये रफ़्तार बनी रही तो मनुष्य जाति विलुप्त भी हो सकती है. ये शोध काफी व्यापक स्तर पर किया गया है. इस शोध में करीब 200 अध्ययनों के परिणामों को आधार बनाया गया है. शोधकर्ताओं ने तो ये तक निष्कर्ष निकाला है कि त्तर अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के पुरुषों में पिछले 40 सालों में शुक्राणुओं की संख्या अब आधी ही रह गई है.

क्या है शोध की विश्वसनियता?

अब चूँकि इस शोध के नतीजे बेहद चौंकाने वाले हैं तो ये सवाल उठना लाजिमी है कि इस शोध की विश्वसनीयता क्या है? तो आपको बता दें कि ये शोध, इस विषय पर किए तमाम पिछले शोधों से बड़ा है. इसमें इसमें 1973 से 2011 के बीच किए गए 185 अध्ययनों के नतीजों को सम्मिलित किया गया है. इस शोध में शामिल एक डॉक्टर का कहना है कि अगर ये ट्रेंड जारी रहा तो मानव जाति लुप्त होने के कगार पर पहुँच सकती है. उनका ये भी कहना था कि यदि हमने अपनी जीवनशैली नहीं बदली तो आने वाले समय में जो होने वाला है वो चिंता का विषय है.

क्या आपको पता है कि शुक्राणुओं (Sperms) की संख्या में कमी से मानव जाति विलुप्त हो जाएगी?
प्रतिकात्मक चित्र

शोध में शामिल थे ये देश

हलांकि ये रिसर्च उत्तरी अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के पुरुषों पर ही फोकस है. इसमें दक्षिण अमरीका, एशिया और अफ्रीका के देश शामिल नहीं हैं और वहां ऐसी कोई गिरावट देखी भी नहीं गई है. इसका एक कारण ये भी है कि इन देशों में अभी इस विषय पर बहुत कम शोध हुए हैं. लेकिन इन देशों में भी ऐसी रुझान देखे जाने की सम्भावना शोधकर्ताओं ने जताई है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here